भारत के श्रेष्ठ मंदिरों में है दिल्ली का छतरपुर ‘आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ’

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी-

भारत में शब्दों की अपनी एक संस्कृति है और प्रत्येक नाम के पीछे कोई गूढ़ अर्थ है। दिल्ली में मां कात्यायनी के लिए प्रसिद्ध हो चुका मंदिर छतरपुर भी इस अर्थ में एक ऐसा नाम और स्थान है, जहां मां भगवती की छत्रछाया यानी कि कृपा दृष्टि अपने भक्तों पर सदैव बनी रहती है।

वास्तव में यह जो छतर शब्द है इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द छत्र से हुई है, छत्र का अर्थचिह्न और रक्षा से लिया जाता है। कालान्तर में छत्र का छतर हो गया और पुर के अर्थ में छोटा नगर या कस्बा है, तब इस संदर्भ में दिल्ली का यह क्षेत्र छतरपुर हो गया है। इसके साथ ही यह शब्द छत्र, क्षत्रिय के अर्थ में रक्षा करनेवाला और छात्र जिसे छाया की अर्थात संरक्षण में ज्ञान प्राप्ति की आवश्यकता है, इस अर्थ में विद्यार्थी के लिए भी यह प्रयुक्त होता है।

1974 में स्थापित हुआ आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर

कर्णाटक के संत बाबा नागपाल ने जब 1974 में यहां ”आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर ” की स्थापना की होगी, तब उनके मन में भी संभवत: इस अर्थ और स्थान के चयन को लेकर गहन विचार चलता रहा होगा। फिर यह भी विचारणीय है कि कात्यायनी का मंदिर ही क्यों ? आद्य शक्ति के अनेक नाम हैं, उनके अनेक विग्रह और स्वरूप हैं, फिर बाबा नागपाल को इन्हीं ‘आद्या कात्यायनी’ स्वरूप में आराधना की आवश्यकता एवं स्थापना की कल्पना क्यों हुई होगी ?

मां कात्यायनी के जीवन का रहस्य

वास्तव में जब इसका उत्तर खोजने जाएं तो कुछ बातें सहज ही सामने आ जाती हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में मां कात्यायनी का उल्लेख प्रथम किया गया है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दिए गए सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का रचित है।

इसके अतिरिक्त मां कात्यायनी का वर्णन देवीभागवत पुराण और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है, जिसे कि 500 ईसा पूर्व लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका पुराण (10वीं शताब्दी) में भी शक्ति के कात्यायनी स्वरूप का उल्लेख मिलता है, जिसमें उड़ीसा को देवी कात्यायनी का मूल स्थान बताया गया है।

ये है कात्यायनी नाम के पीछे की कथा

माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है। कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में श्रेष्ठ महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए अनेक वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।

उनकी उत्पत्ति को लेकर एक अन्य कथा भी है, जिसमें बताया गया है कि ये महर्षि कात्यायन के घर सीधे तौर पर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।

ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी

माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसके अतिरिक्त जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा हो, उन्हे माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हें मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।

विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र – ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥ मंत्र जाप का विधान है। इस मंत्र के प्रभाव को सनातन हिन्दू धर्म के मानने वाले अनेकों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया है।

भारत का आध्यात्मिक ज्ञान यह कहता भी है कि आपका चिंतन आपके चित्त का निर्माण करता है, इसी चित्त से चिति जुड़ी हुई है। जब चिति यानी चेतना का विकास और विस्तार होता है, तो इसके प्रभाव में जो कुछ भी आता है, वह आपके जीवन को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभावित करने लगता है और यही प्रभाव आपकी इच्छित कामनाओं को पूरा करने का कारण बनता है। इसी दृष्टि से मां कात्यायनी के इस कवच श्लोकों को भी यदि कोई पढ़े तो भी उसे बहुत कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है।

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।

ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥

कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

नवरात्रि का छठा दिन है माँ कात्यायनी की उपासना का दिन

नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना बताया गया है।

माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला वर मुद्रा में है। बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। सनातन मान्यता है कि माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ फलों की प्राप्ति होती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

छतरपुर मंदिर बनाया गया सफेद संगमरमर से दक्षिण भारतीय शैली में

आद्या कात्यायिनी मंदिर या छतरपुर मंदिर दिल्ली के सबसे बड़े और सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में एक है। जब तक अक्षरधाम मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था, तब तक यही एक यहां सबसे बड़ा मंदिर था, अब यह बड़े मंदिरों में दूसरे स्थान पर है। यह मंदिर गुंड़गांव-महरौली मार्ग के निकट छतरपुर में स्थित है।

दक्षिण भारतीय शैली में बना यह मंदिर विशाल क्षेत्र में फैला है। मंदिर परिसर में खूबसूरत लॉन और बगीचे हैं। लगभग 20 छोटे-बड़े मंदिर हैं जो अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित हैं। जिनका निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है।

मंदिर में सभी जगहों पर जाली से काम करवाया गया है, जिसे कि वास्तुकला की नजर में वेसारा वास्तुकला कहा जाता है। इसमें भगवान शिव, भगवान गणेश, भगवान हनुमान, राधा-कृष्णा और भगवान राम को समर्पित मंदिर पत्थर पर बहुत बारीक कारीगरी से निर्मित किए गए हैं। इन सभी मंदिरों में दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय वास्तुकला शैली का मिश्रण साफ झलकता है।

यहां आप मन्दिर के परिसर में बहुत बड़ा दरवाजा लगा देख सकते हैं, जिस पर एक बड़ा ताला लगा हुआ है, यह सभी के लिए आकर्षण का केन्द्र है। मंदिर में मां दुर्गा के नौ रूपों के बीच भव्य शिवलिंग भी स्थापित है। भगवान शिव के इस अलौकिक रूप की भव्यता की अनुभूति यहां आते ही आपको होती है। वहीं आपको माता की सेवा में यहां महावीर हनुमान जी के भी दर्शन हो जाते हैं। अपने रक्त वर्ण में हनुमान जी की शोभा देखते ही बनती है।

जहां आज भव्य मंदिर है, वहां कभी होती थी बाबा नागपाल की कुटिया

यहां माता के दरबार के साथ बाबा नागपाल का भी भव्य कक्ष भी है। यहां बने बाबा के शयनकक्ष, बैठक और मोम से बनी उनकी प्रतिमूर्ति एकदम आपका ध्यान अपनी ओर खींचती है। दरअसल, आज जहां आप भव्य मंदिर देखते हैं वहां एक समय में संत बाबा नागपाल की कुटिया हुआ करती थी, फिर जब बाबा ने यहां मां का शक्तिपीठ स्थापित करने का संकल्प लिया तो देखते ही देखते या कहें उनके संकल्प के प्रभाव से यहां धीरे-धीरे मंदिर का क्षेत्रफल 70 एकड़ तक फैल गया। इस मंदिर में मां दुर्गा अपने छठे रूप माता कात्यायनी के रौद्र स्वरूप में दिखाई देती हैं।

माँ के श्रृंगार के लिए प्रतिदिन आते हैं यहां दक्षिण भारत से एयरलिफ्ट होकर फूल

कात्यायनी की विशाल सोने की मूर्ति दुनिया के हर हिस्से से भक्तों को आकर्षित करती है। यह मूर्ति हमेशा चमचमाते कपड़ों चमकदार ज्वैलरी और भारी हार से सजी रहती है। जिनके एक हाथ में चण्ड-मुण्ड का सिर और दूसरे में खड्ग लिए माता, अपने भक्तों के सब दुख हरने वाली प्रतीत होती हैं। इस मंदिर में माता के दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुगण आते हैं।

यहां माता का स्वरूप देखते ही बनता है। माता कात्यायनी का श्रृंगार यहां प्रतिदिन सुबह तीन बजे से शुरू कर दिया जाता है। जिसमें प्रयुक्त वस्त्र, आभूषण और माला इत्यादि फिर कभी दोहराए नहीं जाते हैं। मां कात्यायनी के श्रृंगार के लिए पहनाई जानेवाली फूलों की माला को खास दक्षिण भारत से प्रति दिवस एयरलिफ्ट कराकर मंगवाया जाता है ।

परिसर से जुड़ी है चमत्कारी पेड़ की कथा

इस मंदिर में वैसे तो वर्ष भर लोगों का आना जाना लगा ही रहता है परंतु नवरात्रि के पर्व के समय इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है । लाखों की संख्या में भक्तगण मां के दर्शन करने यहां आते हैं। कई लोग नंगे पांव पैदल ही माता के दर्शनों के लिए छतरपुर मंदिर आते हैं। यहां एक पेड़ ऐसा भी है जहां श्रद्धालु धागे और रंग-बिरंगी चूड़ियां बांधते हैं। इस पेड़ के साथ बंधे हुए धागे की प्रत्येक गाँठ में श्रद्धा, भक्ति और भक्तों के दिलों में धार्मिक आस्था की एक चमत्कारी कहानी विद्यमान है। लोगों का मानना है कि ऐसा करने से मनोकामना पूर्ण होती है।

सेवा कार्यों के लिए भी प्रसिद्ध है दिल्ली का ये भव्य मंदिर

यहां धर्मार्थ भी अनेक सामाजिक कार्यों का संचालन होता है। जिसमें मंदिर परिसर में ही धर्मशाला, विद्यालय और चिकित्सालय सहित आईआईटी के संचालन का जिक्र प्रमुख रूप से किया जा सकता है। गरीबों के लिए अन्नदान और भण्डारे का आयोजन भी यहां हमेशा होता रहता है।

बिना किसी भेदभाव के मां का दरबार सभी के लिए समान रूप से सेवार्थ खुला हुआ है। हर किसी के लिए प्रसादी के रूप में भोजन की व्यवस्था यहां माता के भक्तों द्वारा की गई है। इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यह ग्रहण में भी खुला रहता है और इस मंदिर से जुड़े भक्त प्रतिदिन अपने सेवा कार्यों में कोई कटौती नहीं करते हैं।

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