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Home - देश - ‘किस तरह का कल्चर बना रहे हैं?’ मुफ्त योजनाओं पर भड़के CJI, रोजगार पर जोर दिया

‘किस तरह का कल्चर बना रहे हैं?’ मुफ्त योजनाओं पर भड़के CJI, रोजगार पर जोर दिया

UB News Network
Last updated: फ़रवरी 19, 2026 6:04 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 2 महीना पहले
‘किस तरह का कल्चर बना रहे हैं?’ मुफ्त योजनाओं पर भड़के CJI, रोजगार पर जोर दिया
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नई दिल्ली

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने फ्रीबीज बांट रहे राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि आखिर करदाता के अलावा इन योजनाओं का खर्च और कौन उठाएगा। उन्होंने का कि भोजन और बिजली के बाद अब सीधा कैश ट्रांसफर होने लगा है। साथ ही अदालत ने कहा है कि सरकार को रोजगार पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास पर अब कम खर्च किया जा रहा है।

गुरुवार को सीजेआई ने कर्ज के बाद भी राज्यों की तरफ से मुफ्त में चीजें बांटने पर चिंता जाहिर की। उन्होंने सवाल किया, ‘आखिर करदाता नहीं, तो इन योजनाओं के लिए भुगतान कौन करेगा?’ सुप्रीम कोर्ट ने नकद बांटने और मुफ्त की सुविधाएं देने को लेकर वित्तीय समझदारी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने का कोर्ट का कहना है कि राज्यों को मुफ्त की रेवड़ियां या ‘डोल्स’ बांटने के बजाय रोजगार पैदा करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

सीजेआई ने चेताया है कि विकास पर अब कम खर्च किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘अगर आप मुफ्त खाना…, मुफ्त साइकिल…, मुफ्त बिजली देने लगेंगे… और अब तक सीधा कैश ट्रांसफर हो रहा है।’ सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा है कि कई राज्य राजस्व घाटे का सामना कर रहे हैं, लेकिन फिर भी कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार किए हुए हैं। कोर्ट का मानना है कि कर्मचारियों के वेतन और ‘मुफ्त की सुविधाओं’ का बोझ इतना बढ़ गया है कि वे विकास के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक साल में जुटाए गए राजस्व का 25 प्रतिशत हिस्सा…, इसे विकास में क्यों नहीं लगाया जा सकता?

सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई कर रहा था। अदालत ने निगम को उपभोक्ता की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को मुफ्त बिजली देने का वादा करने के लिए फटकार लगाई। कोर्ट ने मुफ्त की सेवा के कल्चर की कड़ी आलोचना की। साथ ही कहा कि यह आर्थिक विकास में बाधा डालती है।

क्या है फ्रीबीज वाला मामला?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट आज तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2024 के रूल 23 को चुनौती दी गई थी. इस याचिका पर सुनवाई के दौरान ही सीजेआई सूर्यकांत फ्रीबीज पर भड़क गए. उन्होंने तमिलनाडु के साथ-साथ अन्य राज्यों को भी इस मामले में अच्छे से सुना दिया. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड की उस याचिका पर आई, जिसमें सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया था, चाहे उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो.

चलिए सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत ने क्या-क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले फ्रीबी कल्चर पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि अब ऐसे नीतियों पर फिर से विचार करने का समय आ गया है, क्योंकि इससे देश का आर्थिक विकास रुक जाता है. तमिलनाडु सरकार द्वारा चुनाव से पहले ‘फ्रीबी’ बांटने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया, ‘आप किस तरह की संस्कृति विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं?’

    सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, ‘देश के ज्यादातर राज्य राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं, फिर भी वे विकास को नजरअंदाज कर इस तरह की मुफ्त चीजें बांट रहे हैं.’

    पीठ ने कहा कि इस तरह की मुफ्त चीजों की बांटने से देश का आर्थिक विकास प्रभावित होता है और राज्यों को सभी को मुफ्त भोजन, साइकिल, बिजली देने के बजाय रोजगार के अवसर खोलने चाहिए.

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके सरकार के नेतृत्व वाली पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है, जिसमें मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया है.

    पीठ ने पूछा, “हम भारत में किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? यह समझ में आता है कि आप कल्याणकारी योजना के तहत उन लोगों को मुफ्त बिजली देना चाहते हैं जो बिजली का बिल चुकाने में असमर्थ हैं. लेकिन बिना यह फर्क किए कि कौन भुगतान कर सकता है और कौन नहीं, आप सबको बांटने लगते हैं. क्या यह तुष्टिकरण नीति नहीं है?’

    पीठ ने पूछा कि बिजली दरें घोषित होने के बाद तमिलनाडु कंपनी ने अचानक मुफ्त बांटने का फैसला क्यों किया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘राज्यों को रोजगार के अवसर खोलने चाहिए. अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन, फिर मुफ्त साइकिल, फिर मुफ्त बिजली देने लगेंगे तो कौन काम करेगा और फिर काम करने की संस्कृति का क्या होगा?’

    पीठ ने कहा कि राज्य विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय दो काम करते हैं- वेतन देना और इस तरह की मुफ्त चीजें बांटना.

 

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