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माघी मेले में आदिवासी धर्मगुरुओं ने उत्तरवाहिनी गंगा में लगाई आस्था की डुबकी

UB News Network
Last updated: जनवरी 31, 2026 8:52 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 2 सप्ताह पहले
माघी मेले में आदिवासी धर्मगुरुओं ने उत्तरवाहिनी गंगा में लगाई आस्था की डुबकी
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साहिबगंज.

झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल में उत्तरवाहिनी गंगा तट पर लगने वाला माघी मेला वर्षों से आस्था, परंपरा और सांझी संस्कृति का प्रतीक बना हुआ है. माघी पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है.

झारखंड ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और नेपाल से भी हजारों आदिवासी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. इसी व्यापक सहभागिता के कारण इस मेले को आदिवासियों का ‘महाकुंभ’ कहा जाता है.

शनिवार को श्रद्धालुओं ने किया गंगा स्नान
मंगलवार से ही आदिवासी साफाहोड़ श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के साथ उत्तरवाहिनी गंगा में आस्था की डुबकी लगाने लगे हैं. यह सिलसिला लगभग चार दिनों तक चलता है. पूर्णिमा मुहूर्त से पहले, पूर्णिमा के दौरान और उसके बाद भी श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं. स्नान के बाद घंटों सूर्योपासना, ध्यान और आराधना की जाती है. इसके उपरांत श्रद्धालु कांसे के लोटे में गंगा जल लेकर अपने अखाड़ों की ओर प्रस्थान करते हैं.

गुरु-बाबाओं के अखाड़े, आस्था का केंद्र
मेला परिसर में लगे गुरु बाबाओं के अखाड़े इस आयोजन का सबसे विशिष्ट आकर्षण हैं. हर अखाड़ा एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में नजर आता है, जहां गुरु और शिष्य के बीच गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध दिखाई देता है. इन अखाड़ों में केवल आदिवासी ही नहीं, बल्कि गैर-आदिवासी श्रद्धालु भी बैठते हैं. यह दृश्य आदिवासी-गैरआदिवासी सांझी संस्कृति का दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करता है.

गुरु-शिष्य परंपरा का अनोखा स्वरूप
राजमहल का यह मेला गुरु-शिष्य परंपरा का एक प्राचीन और अनोखा उदाहरण है. यहां गुरु बाबा अपने शिष्यों के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों का निवारण अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक शैली से करते हैं. शिष्य अपने गुरु के प्रति अपार श्रद्धा और विश्वास रखते हैं और अपना जीवन उनके मार्गदर्शन में समर्पित कर देते हैं. मान्यता है कि गुरु बाबा की कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है.

मांझी हड़ाम की आराधना और शिव तत्व
गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु अपने अखाड़ों में मांझी हड़ाम यानी शिव की गुरु पूजा करते हैं. त्रिशूल, तुलसी और शिव चित्र स्थापित कर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं. साफाहोड़ समुदाय के लोग शिव को अपने इष्टदेव के रूप में पूजते हैं और उनसे शांति, समृद्धि और संरक्षण का आशीर्वाद मांगते हैं. मंत्रोच्चारण की शैली भले ही संस्कृत या देवनागरी से अलग हो, लेकिन ‘ऊं’ के उच्चारण के साथ आस्था की गहराई स्पष्ट झलकती है.

विदिन होड़ समाज की परंपराएं
विदिन होड़ समाज के लोग मांझी स्थान और जाहेर स्थान बनाकर पूजा करते हैं. राजमहल गंगा तट पर कुछ स्थायी मांझी स्थान भी हैं, जहां हर वर्ष विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं. इन स्थानों पर सामूहिक पूजा, बलि-प्रथा से दूर प्रतीकात्मक अर्पण और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना प्रमुख रहती है.

सादगी और संयम का जीवन दर्शन
मेला के दौरान आदिवासी समुदाय विशेष रूप से सादगी और संयम का पालन करता है. साफाहोड़ और विदिन होड़ आदिवासी इन दिनों मांस-मदिरा तो दूर, प्याज और लहसुन तक का सेवन नहीं करते हैं. विशुद्ध सादा भोजन, ब्रह्मचर्य और अनुशासन उनके जीवन का आधार होता है. आधुनिक चकाचौंध से दूर यह जीवन शैली उनकी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करती है.

सर्द रातों में अखाड़ा, सूर्योदय से पहले स्नान
सर्द भरी रातों में गुरु और शिष्य मिलकर अखाड़ा तैयार करते हैं. सूर्योदय से पहले ही सभी गंगा स्नान के लिए नदी में प्रवेश कर जाते हैं. घंटों की उपासना के बाद भीगे वस्त्रों में ही अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं. यह कठोर साधना आस्था की गहराई और संकल्प की मजबूती को दर्शाती है.

सांझी संस्कृति का जीवंत उदाहरण
राजमहल का आदिवासी महाकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव भी है. यहां आदिवासी और गैर-आदिवासी, दोनों समुदाय एक साथ गंगा स्नान और पूजा में सहभागी बनते हैं. यह मेला साबित करता है कि आस्था और परंपरा समाज को जोड़ने का सबसे मजबूत माध्यम है.

TAGGED:BiharTribal Religious Leaders
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