शिव धनुष टूटते ही राम की हो गईं सीता

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आजमगढ़, 10 अक्टूबर (वेब वार्ता)। श्रीरामलीला समिति पुरानी कोतवाली के तत्वावधान में चल रही श्रीरामलीला के पांचवें दिन शनिवार की रात धनुष यज्ञ और लक्ष्मण-परशुराम संवाद का मंचन किया गया।भगवान शिव का धनुष टूटते ही श्रीराम के जयकारे से पंडाल गूंज उठा, वहीं सीताजी ने वरमाला डाली, तो सीता-राम का जयकारा लगने लगा। लक्ष्मण-परशुराम के संवाद ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सीता स्वयंवर में अनेक राजा आए। धनुष तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। स्वयंवर में बैठे श्रीराम, लक्ष्मण और विश्वामित्र चुपचाप सब कुछ देखते रहे। तभी राजा जनक कहते हैं कि अगर मुझे यह मालूम होता कि यह पृथ्वी वीरों से खाली है, तो मैं कभी सीता के विवाह के लिए कोई शर्त नहीं रखता।इस पर लक्ष्मण खड़े होकर कहते हैं कि ऐसा मत कहें, यदि गुरु विश्वामित्र हमें आज्ञा दें तो मैं अभी इस धनुष को खंड-खंड कर दूं। इस पर विश्वामित्र लक्ष्मण को बैठने को कहते हैं और श्रीराम को आज्ञा देते हैं। श्रीराम धनुष को तोड़ देते हैं और सीता जी भगवान श्रीराम के गले में वरमाला डाल देती हैं। वरमाला डालते ही आकाश से देवी-देवता पुष्पों की बारिश करते हैं। उधर जब परशुराम को भगवान शिव के धनुष के टूटने की खबर लगती है, तो वे गुस्से में राजा जनक के दरबार पहुंच अपना क्रोध प्रकट करते हैं। परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखी नोकझोंक होती है। जब परशुराम को पता चलता है कि राम विष्णु के अवतार हैं तो वे राम को प्रणाम करते हैं। रामलीला मंचन के दौरान बीच-बीच में लगाए जा रहे जयकारे से क्षेत्र राममय हो गया।

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