यूपी के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना सहित छह राज्य के प्रतिनिधि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे के लाने के पक्ष में नहीं

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लखनऊ/नई दिल्ली, 17 सितंबर (वेब वार्ता)। नरेन्द्र मोदी सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण लखनऊ में चल रही जीएसटी काउंसिल की बैठक की अध्यक्षता कर रही हैं। सभी की निगाह इस बैठक में पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने वाले निर्णय पर भले ही है, लेकिन बैठक के संयोजक उत्तर प्रदेश सरकार के ही मंत्री इसके पक्ष में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना के साथ में जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक में शामिल छह अन्य राज्यों के वित्त मंत्री पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में शामिल करने पक्ष में नहीं है। इससे तो तय है कि बैठक में पेट्रोल व डीजल को जीएसटी में लाने का प्रस्ताव अगर रखा भी जाता है तो वह खारिज हो सकता है।

बैठक में सात राज्यों के उप मुख्यमंत्री शामिल हुए हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश के चौना मेन, बिहार के उप मुख्यमंत्री राज किशोर प्रसाद, दिल्ली के मनीष सिसोदिया, गुजरात के नितिन पटेल, हरियाणा के दुष्यंत चौटाला, मणिपुर के युमनाम जोए कुमार सिंह और त्रिपुरा के जिष्णु देव वर्मा शामिल हैं। इसके अलावा कई राज्यों के वित्त या फिर मुख्यमंत्री की ओर से नामित मंत्री भी शामिल हुए हैं। केन्द्र सरकार ने एक देश -एक दाम के तहत पेट्रोल-डीजल, नेचुरल गैस और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (विमान ईंधन) को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार किया था। इसी को लेकर बैठक में चर्चा की गई। ज्यादातर राज्यों ने पेट्रोलियम पदार्थों को त्रस्ञ्ज के दायरे में शामिल करने का विरोध किया।

बैठक से पहले ही उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने संकेत दिया था कि वह पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करेंगे। काउंसिल की बैठक से पहले वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा था कि उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स को जीएसटी के अंतर्गत लाने के खिलाफ है। काउंसिल की बैठक में जोमैटो और स्विगी जैसे फूड डिलीवरी ऐप्स को रेस्टोरेंट की तरह मानने और उनके द्वारा की गई डिलीवरी पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगाने का फैसला भी लिया जा सकता है। ऐसा हुआ तो रेस्टोरेंट की बजाय फूड डिलीवरी ऐप्स को जीएसटी सरकार के पास जमा करवाना होगा, इससे ग्राहकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लखनऊ के होटल ताज में जीएसटी (गुड्स एंड सॢवसेज टैक्स) काउंसिल की 45वीं बैठक केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में चल रही है। इस बैठक में जैसे ही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया तो कई राज्य इसके विरोध में खड़े हो गए। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल समेत ज्यादातर राज्यों ने पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे से बाहर ही रखने को कहा है। ऐसे में तो यह प्रस्ताव खारिज हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के के दायरे में लाया जाता है तो पेट्रोल 28 रुपए और डीजल 25 रुपए तक सस्ता हो जाएगा। इसके विपरीत राज्यों का राजस्व बढ़ाने का बड़ा जरिया भी इसके कर से मिलने वाला धन है। इसी कारण अधिकांश राज्य पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के पक्ष में नहीं हैं।

काउंसिल की इस बैठक में 48 से ज्यादा वस्तुओं पर टैक्स दरों की समीक्षा की जा जा रही है। इसमें 11 कोविड दवाओं पर टैक्स छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने का भी फैसला हो सकता है। लखनऊ में चल रही इस बैठक के ब्रेक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण से भेंट की और फिर गोरखपुर के लिए रवाना हो गए। राज्यों को जीएसटी राजस्व में कमी की भरपाई के लिए समय सीमा बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है। कोविड 19 के इलाज में काम आने वाली दवाओं पर छूट की अवधि को बढ़ाने का फैसला हो सकता है। जीएसटी की समस्त प्रक्रियाओं के लिए एकीकृत पोर्टल लांच करने के बारे में निर्णय हो सकता है। विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की दरों की समीक्षा भी होगी।

जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक देश में कोरोना महामारी के प्रकोप के बाद काउंसिल की पहली फिजिकल बैठक है। इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर विचार किया जा सकता है। इससे पिछली बैठक 12 जून को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई थी। इसमें कोविड-19 महामारी के खिलाफ जंग में अहम कई आइटम्स पर जीएसटी रेट्स में कटौती करने का फैसला किया गया था। शुक्रवार की बैठक में इस छूट को और 3 महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। यह बैठक आम जनता के लिए भी कई मामले में महत्वपूर्ण है। काउंसिल की इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिसका असर कारोबारियों से लेकर आम आदमी पर पड़ेगा।

बैठक में जोमैटो तथा स्विगी जैसे खाद्य डिलीवरी ऐप को रेस्टोरेंट के रूप में मानने और उनकी डिलीवरी पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने के प्रस्ताव पर भी विचार होगा। कमेटी के फिटमेंट पैनल ने काउंसिल से फूड डिलिवरी ऐप्स को कम से कम 5 परसेंट जीएसटी के दायरे में लाने की सिफारिश की है। काउंसिल के फिटमेंट पैनल ने सिफारिश की है कि फूड एग्रीगेटर को ई-कॉमर्स ऑपरेटर माना जाए। इसके साथ ही फार्मा सेक्टर से जुड़े कुछ ऐलान भी संभव हैं। देश में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) व्यवस्था एक जुलाई, 2017 से लागू हुई थी। जीएसटी में केन्द्रीय कर के रूप में उत्पाद शुल्क और राज्यों के शुल्क में वैट को शामिल किया गया था। पेट्रोल, डीजल, एटीएफ, प्राकृतिक गैस तथा कच्चे तेल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया। इन सभी उत्पादों से केन्द्र और राज्य सरकारों को कर के रूप में बड़ा राजस्व मिलता है।

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