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ग्रामीण अंचलों में वर्षों पुरानी ‘बर्तन प्रथा’ बंद, होली पर नियमों का उल्लंघन कर

UB News Network
Last updated: फ़रवरी 28, 2026 10:24 पूर्वाह्न
By : UB News Network
Published on : 2 सप्ताह पहले
ग्रामीण अंचलों में वर्षों पुरानी ‘बर्तन प्रथा’ बंद, होली पर नियमों का उल्लंघन कर
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भोपाल 
चंद्रवंशी खाती समाज ने सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया है. ग्राम पंचायत खेरी स्थित हनुमान मंदिर में समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि होली के पर्व पर बरसों से चली आ रही ‘बर्तन प्रथा’ को अब पूरी तरह समाप्त किया जाएगा. समाज के इस निर्णय का उल्लंघन करने वाले परिवार पर 5000 रुपये का आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान भी किया गया है.

फिजूलखर्ची रोकने के लिए कड़ा फैसला

बैठक में ग्राम खेरी के सरपंच प्रतिनिधि धनपाल सिंह वर्मा गांव के पटेल मेहरबान सिंह वर्मा के नेतृत्व में समाज के वरिष्ठजनों और प्रबुद्ध नागरिकों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि त्योहारों के नाम पर बढ़ती फिजूलखर्ची और उपहारों के लेन-देन की प्रतिस्पर्धा से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है. ‘बर्तन प्रथा’ जैसी कुरीतियां समाज में भेदभाव पैदा करती हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए समाज ने अब इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. 

क्या है ‘बर्तन प्रथा’?

ग्रामीण अंचलों में विशेषकर होली या दीपावली जैसे बड़े त्योहारों पर, शादीशुदा बेटियों और बहनों के घर (ससुराल) जाकर उन्हें उपहार देने की परंपरा रही है. इस परंपरा में कपड़ों और मिठाई के साथ-साथ पीतल, तांबे या स्टील के बर्तनों का सेट (जैसे थाली, लोटा, बाल्टी या कड़ाही) भेंट करना अनिवार्य माना जाने लगा. इसी लेन-देन की प्रक्रिया को ‘बर्तन प्रथा’ कहा जाता है.

समाज में यह एक तरह की होड़ बन गई कि कौन कितने कीमती और बड़े बर्तन देता है. लोग अपनी आर्थिक स्थिति से बाहर जाकर दिखावा करने लगे.

आर्थिक दबाव: मध्यम और गरीब परिवारों के लिए हर साल होली पर महंगे बर्तन खरीदना एक बड़ा वित्तीय बोझ बन गया. कई बार इसके लिए कर्ज तक लेना पड़ता था.

ससुराल में अपमान का डर: यदि कोई परिवार कम बर्तन देता या साधारण बर्तन ले जाता, तो अक्सर बहू-बेटियों को ससुराल में ताने सुनने पड़ते थे.

ग्रामीणों ने किया फैसले का स्वागत

ग्राम पंचायत खेरी के इस निर्णय की आसपास के क्षेत्रों में भी सराहना हो रही है. ग्रामीणों का मानना है कि इस प्रकार के कड़े निर्णयों से न केवल समाज में समानता आएगी, बल्कि युवाओं को भी फिजूलखर्ची से दूर रहने की प्रेरणा मिलेगी. समाज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि का उपयोग समाज के सामूहिक कार्यों और विकास में किया जाएगा.

ग्रामीणों का कहना है कि समाज के विकास के लिए पुरानी और बोझिल परंपराओं को त्यागना आवश्यक है. होली खुशियों का त्योहार है, इसे सादगी और प्रेम से मनाया जाना चाहिए. यह फैसला समाज के हर वर्ग के हित में लिया गया है.

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