वीर सावरकर को बदनाम करने की कड़ी आगे बढ़ सकती है ?

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प्रमोद भार्गव-

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक ने वीर सावरकर पर लिखी पुस्तक का विमोचन करते हुए एक बड़ी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से ही वीर विनायक दामोदर सावरकर को बदनाम करने की मुहिम चलाई गई है। संभव है, सावरकर के बाद स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और महर्षि अरविंद के विरुद्ध ऐसी ही साजिश रची जाएं, क्योंकि सावरकर इन्हीं महानायकों के विचारों से प्रभावित थे। इसी अवसर पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सावरकर के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण से जुड़े योगदान को किसी वैचारिक चश्मे से देखने की जरूरत नहीं है। उनके योगदान को अनदेखा करना एवं उन्हें अपमानित करना ऐसे काम हैं, जो क्षमा करने योग्य नहीं हैं।

भागवत और सिंह ने ये कथन सावरकर के जीवन पर उदय माहूकर एवं चिरायू पंडित द्वारा लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह में कहे। दरअसल देश में स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही एक षड्यंत्र के तहत वामपंथी बौद्धिकों और कुछ धार्मिक चरमपंथियों ने उस हर व्यक्ति और विचार पर हमले करना शुरू कर दिए थे, जो हिंदुत्व और सनातन ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की बात कर रहे थे। इसीलिए कथित बुद्धिजीवियों ने विवेकानंद, दयानंद और महर्षि अरविंद को तो नाकारा ही, सूरदास, कबीरदास और तुलसीदास के नवजागरण से जुड़े भक्ति आंदोलन और आजादी की लड़ाई के राष्ट्रवादी आंदोलन को भी प्रतिक्रियावादी आंदोलन की संज्ञा देकर समाज से बहिष्कृत करने की कोशिश की। हालांकि ये दार्शनिक, विचारक और लेखक बहुसंख्यक हिंदु समाज के हमेशा ही प्रेरणास्रोत बने रहे।

यही सही है कि इतिहास हमेशा विजेता अपनी इच्छानुसार लिखवा लिया करते हैं। किंतु इसे देश और देश के राष्ट्र-नायकों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 1947 में स्वतंत्र राष्ट्र के अस्तित्व में आने के बावजूद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास अंग्रेज शासकों की मानसिकता से लिखा गया। यही नहीं, वामपंथी इतिहासकारों ने आक्रांताओं को महिमामंडित किया और भारत के मूल निवासी आर्यों को हमलावर बताया। इस दृष्टि से हमें सावरकर पर न केवल तथ्यपरक दृष्टि अपनाने की जरूरत है, बल्कि समूचे भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की भी आवश्यकता है। क्योंकि इन तथाकथित इतिहासकारों ने हिंदू व मुसलमानों में सामंजस्य बिठाने के बहाने इतिहास का विकृतिकरण कहीं ज्यादा किया है।

हालांकि सावरकर का एक वीर योद्धा और इतिहास लेखक के रूप में सम्मान इंदिरा गांधी भी करती थीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस तथ्य की पुष्टि की थी। मई 1970 में इंदिरा गांधी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी करते हुए कहा था कि ‘हम सावरकर के खिलाफ नहीं हैं। वे जीवन भर जिस हिंदुत्वादी विचार का समर्थन करते रहे, हम उसके जरूर खिलाफ हैं। वे सावरकर ही थे, जिन्होंने 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया। सावरकर ने ही लंदन में पहली बार सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन संगठित को सक्रिय किया। दरअसल बाल गंगाधर तिलक और श्याम वर्मा ने उन्हें बैरिस्टर की शिक्षा लेने के बहाने 1906 में क्रांतिकारी आंदोलन को हवा देने की दृष्टि से लंदन भेजा था। तिलक उनसे इसलिए प्रभावित थे, क्योंकि सावरकर 1904 में ही ‘अभिनव भारत’ नाम से एक संगठन अस्तित्व में ले आए थे। लंदन जाने से पहले इसका दायित्व उन्होंने अपने बड़े भाई गणेश सावरकर को सौंप दिया था। इन दोनों भाइयों का मार्गदर्शन तिलक ही कर रहे थे।

लंदन में इंडिया हाउस में ठिकाना बनाकर सावरकर ने भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के लिए एकत्रित किया। इनमें राष्ट्रवाद का अलख जगाया। यहीं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे मदनलाल ढ़ींगरा को अपने प्रभाव में लिया। इसी दौरान सावरकर ने इटैलियन क्रांतिकारी पात्रिका का मराठी में अनुवाद किया और उसे प्रकाशित कराकर भारत में वितरित किया। इसकी प्रस्तावना बेहद प्रभावशाली ढंग से सावरकर ने लिखी, जिसकी तिलक भी खूब प्रशंसा करते थे। 1906 ने सावरकर ने 1857 का स्वतंत्रता समर पुस्तक लिखने का संकल्प लिया। 10 मई 1907 को इस संग्राम की लंदन के ही इंडिया हाउस में 50वीं वर्षगांठ मनाने का निश्चय किया। इस हेतु सावरकर ने ‘फ्री इंडिया सोसायटी’ के नेतृत्व में एक भव्य आयोजन की रूपरेखा बनाई।

फिरंगी हुकूमत को जब इसकी भनक लगी तो उसने इस आयोजन पर अंकुश लगाने के हर संभव प्रयास किए। किंतु सावरकर के वाक्चातुर्य और कानूनी दांव-पेंच के चलते अंग्रेज प्रशासन रोक नहीं पाया। इसी दिन ओजस्वी भाषण देते हुए सावरकर ने इसे तार्किक रूप में सैन्य विद्रोह अथवा गदर के रूप में खारिज किया और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का पहला सशस्त्र युद्ध घोषित किया। इस पहली लड़ाई को ‘संग्राम’ का दर्जा देने वाले वे पहले भारतीय थे।

इंडिया हाउस में रहते हुए ही सावरकर ने मराठी एवं अंग्रेजी में ‘1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ शीर्षक से करीब एक हजार पृष्ठों की इतिहास-पुस्तक लिखी। भारतीय दृष्टिकोण और ऐतिहासिक सच्चाइयों को तथ्य, साक्ष्य व घटनाओं के साथ किसी भारतीय इतिहास लेखक द्वारा लिखी यह पहली इतिहास-पुस्तक थी। इसके बाद स्वतंत्रता पर ‘भारत में अंग्रेजी राज’ शीर्षक से पंडित सुंदरलाल ने दो खंडों में पुस्तक लिखी। भारत में अंग्रेजों ने किन-किन कुटिलताओं, लूट की वारदातों और हिंसक घटनाओं को अंजाम देकर दमनकारी राज की स्थापना की, इसके प्रमाणों का दस्तावेजीकरण केवल इन्हीं पुस्तकों में है। दुर्भाग्य से ये दोनों ही पुस्तकें भारत में इतिहास के पाठ्यक्रमों और इतिहास शिक्षकों की दृष्टि से ओझल हैं।

खैर, सावरकर को इस पुस्तक के प्रकाशन में बड़ी समस्या पेश आई, क्योंकि अंग्रेज उनकी प्रत्येक गतिविधि पर निगाह रखे हुए थे। अंग्रेजों ने इस पाण्डुलिपि को पढ़े बिना ही इसके प्रकाशन पर कानूनी रोक लगा दी। यह पहली ऐसी भारतीय पुस्तक थी, जिसे कानूनी प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। यह अंग्रेजी में ‘द हिस्ट्री ऑफ द वार ऑफ इण्डिन इंडिपेंडेंस 1857’ शीर्षक से लिखी। इसे लंदन, पेरिस व जर्मनी से प्रकाशित कराने के प्रयास जब असफल हो गए, तब अंततः मैडम कमा की कोशिशों से हॉलैंड से छपाया गया। पुस्तक उत्साही युवा फ्रांस के रास्ते से भारत लाए।

पहला संस्करण प्रतिबंध के बावजूद हाथों-हाथ बिक गया। स्वाधीनता के प्रति समर्पित क्रांतिकारियों ने इसे ‘गीता’ की तरह अपने पास रखा और स्वतंत्रता समर में आहुति देने की प्रेरणा ली। इसका दूसरा संस्करण भी मैडम कामा ने ही जर्मनी से प्रकाशित कराया। पाठकों को आश्चर्य होगा कि वामपंथी विचारों से प्रेरित माने जाने वाले उद्भट्ट क्रांतिकारी भगत सिंह ने इसका तीसरा संस्करण प्रकाशित कराया और मूल्य भी ज्यादा रखा, जिससे संगठन के लिए धन इकट्ठा किया जा सके। भगत सिंह ने सावरकर से रत्नागिरी में मुलाकात करके अनुमति ली थी। इस पुस्तक को लोग ढूंढ-ढूंढकर पढ़ते व पढ़ाते थे।

इसी कालखंड में सावरकर और मैडम कामा ने मिलकर ‘राष्ट्रीय-ध्वज’ बनाया। दरअसल जर्मनी के स्टूगार्ड नगर में समाजवादियों का वैश्विक सम्मेलन आयोजित था। सावरकर की इच्छा थी कि इसमें कामा द्वारा भारत के ध्वज का ध्वजारोहण किया जाए। सावरकर इस उद्देश्य की पूर्ति में सफल हुए। इस ध्वजारोहण की खबर ब्रिटेन समेत दुनिया भर के समाचार-पत्रों में प्रमुखता से छपी। ब्रिटिश विरोधी यूरोप के कई देशों ने तो इस क्रांतिकारी कार्यवाही को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए लज्जा का विषय बताया। सावरकर के इस अभियान से प्रभावित होकर रूसी क्रांतिकारियों से उनकी निकटता बढ़ गई। नतीजतन इन्हीं से सावरकर को बम बनाने की तकनीक सिखाने वाली पुस्तक मिली। भारत में इसी पुस्तक से क्रांतिकारियों ने बम बनाने की दक्षता हासिल की।

दरअसल सावरकर चाहते थे कि समूचे भारत में एक दिन, एक ही समय अंग्रेजी-सत्ता के कई ठिकानों पर बम-विस्फोट करके इसकी चूलें हिला दी जाएं। हालांकि सावरकर तो यह नहीं कर पाए, लेकिन भगत सिंह और उनके समकालीन क्रांतिकारियों ने सावरकर की इस मंशा की कालांतर में पूर्ति की।

इस समय तक सावरकर तिलक के बाद सबसे ज्यादा ख्यातिलब्ध क्रांतिकारी हो गए थे। इसी कालखंड में 11 अगस्त 1908 को 18 साल के बंगाली युवा खुदीराम बोस, कन्हैयालाल दत्त, सतिंदर पाल तथा पं. कांशीराम को फांसी दी गई। खुदीराम पर 6 दिसंबर 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन और फिर मुजफ्फपुर में अंग्रेज अधिकारी किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फोड़ने के आरोप थे। बग्घी में एक अन्य अंग्रेज अधिकारी की पत्नी और बेटी बैठी थीं, जिनकी इस विस्फोट में मौत हो गई थी। ‘गीता’ हाथ में लेकर फांसी का फंदा चूमने वाले खुदीराम सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे।

इन सजाओं से सावरकर बहुत विचलित हुए और उन्होंने इन फांसियों के जिम्मेदार अधिकारी एडीसी सर कर्जन वायली से बदला लेने की ठान ली। मदनलाल ढींगरा ने उनकी इस योजना में जान हथेली पर रखकर शिरकत की। सावरकर ने उन्हें रिवॉल्वर हासिल कराई। जब कर्जन लंदन में भारतीयों के एक कार्यक्रम में भागीदारी करने आया, तब दुस्साहसी ढींगरा ने अवसर पाते ही कर्जन के मुंह में पांच गालियां उतार दीं और आत्मसमर्पण कर दिया। इस जानलेवा क्रांतिकारी गतिविधि से अंग्रेज हुकूमत की बुनियाद हिल गई। यूरोप के अखबारों में ब्रिटिशों को परेशानी में डाल देने वाले शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुए- ‘हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध अंग्रेजों की ही धरती पर युद्ध प्रारंभ कर दिया है।’ इस घटना के फलस्वरूप समूचे भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध माहौल बनने लगा।

कुछ अंग्रेज भक्त भारतीयों ने इस घटना की निंदा के लिए लंदन में आगा खां के नेतृत्व में एक सभा आयोजित की। इसमें आगा खां ने कहा कि ‘यह सभा आम सहमति से एक स्वर में मदनलाल ढींगरा के कृत्य की निंदा करती है।’ किंतु इसी बीच एक हुंकार गूंजी, ‘नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता। मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूं।’ इस समय तक आगा खां सावरकर को पहचानते नहीं थे। तब उन्होंने परिचय देने को कहा। सावरकर बोले, ‘जी मेरा नाम विनायक दामोदर सावरकर है और मैं इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं करता हूं।’ अंग्रेजों की धरती पर उन्हीं के विरुद्ध हुंकार भरने वाले वे पहले भारतीय थे।

इसी समय सावरकर को अपने इकलौते पुत्र प्रभाकर की मृत्यु का समाचार मिला। किंतु वे विचलित नहीं हुए। यही वह समय था, जब ब्रिटिश सरकार उनकी गतिविधियों और सत्ता में बढ़ते दखल से तंग आ चुकी थी। लिहाजा उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध करने, युवाओं को भड़काने और बम बनाने का साहित्य प्रसारित करने के अरोपों में 13 मार्च 1910 को गिरफ्तार कर लिया। लंदन की ओल्ड बिकी कोर्ट में उन्हें उपस्थित किया गया। यहां उन पर भारत में अभियोग चलाने का आदेश दिया गया। जिस जहाज से उन्हें भारत ले जाया जा रहा था, वह फ्रांस के बंदरगाह मॉसे से गुजरता था। इसलिए उन्होंने मॉसे पहुंचने पर जहाज से छलांग लगा देने की योजना बनाकर अपने साथियों को सूचना भिजवा दी कि मॉसे के तट पर मिलें। वे जानते थे कि यदि इस योजना में सफल हो जाते हैं तो फ्रांस की धरती पर पहुंच जाने के कारण अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाएंगे। दूसरे अंग्रजों की व्यवस्था में सेंध लग जाती है तो अखबारों में उनका मजाक उड़ेगा। अंततः मॉसे पहुंचने पर सावरकर शौचालय की खिड़की से समुद्र में कूदने में तो सफल हो गए, लेकिन तट पर पहुंचने से पहले ही पकड़ लिए गए। यह घटना ‘वीर सावरकर की छलांग’ के नाम से जानी जाती है।

24 सितंबर 1910 को उन्हें अदालत में पेश किया गया। यहां उन्हें दोहरे आजीवन करावास की सजा दी गई और अंडमान-निकोबार की कालापानी जेल भेज दिया गया। यहां की काल-कोठरी में अमानवीय अत्याचार भोगते हुए उन्होंने दस साल यातना मयी जीवन गुजारा। तत्पश्चात माफीनामा लिखकर उन्होंने जेल से मुक्ति पाई।

इस कोठरी पर भी कालजयी साहित्य की वे रोजाना नई पंक्तियां लिखते थे और उन्हें कंठस्थ करने के बाद मिटाकर फिर नई पंक्तियां लिखते थे। यह माफीनामा उन्होंने केवल अपने जीवन की सुरक्षा के लिए न लिखकर, जेल से बाहर आने का बहाना ढूंढने के लिए लिखा था। क्योंकि दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया था और सावरकर इसमें भागीदारी करके आजादी का रास्ता तलाशने के इच्छुक थे। शायद इसीलिए महात्मा गांधी ने 8 मई 2021 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा था, ‘यदि भारत इसी तरह सोया रहा तो मुझे डर है कि उसके दो निष्ठावान पुत्र सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश हाथ से चले जाएंगे। लंदन में मुझे सावरकर से भेंट का सौभाग्य मिला था। वे बहादुर हैं, चतुर हैं और देशभक्त क्रांतिकारी हैं। ब्रिटिश प्रणाली की बुराइयों को उन्होंने बहुत पहले ही ठीक से समझ लिया था।’

याद रहे नजरबंद सुभाषचंद्र बोस को भारत से बाहर जाकर ब्रिटेन के शत्रु राष्ट्रों से सैनिक सहयोग लेने की सलाह सावरकर ने ही दी थी। बोस का देश से पलायन और फिर आजाद हिंद फौज के सेनापति के रूप में सामने आना ही, ऐसा एक बड़ा कारण था, जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश किया था। क्योंकि उन्होंने उस सेना को ही अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा कर दिया था, जिसके बूते अंग्रेज भारत को गुलाम बनाए हुए थे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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