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बांग्लादेश के ख़िलाफ़ आईसीसी का कड़ा रुख

UB News Network
Last updated: जनवरी 12, 2026 1:47 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 3 महीना पहले
बांग्लादेश के ख़िलाफ़ आईसीसी का कड़ा रुख
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बांग्लादेश के ख़िलाफ़ आईसीसी का कड़ा रुख

●  नीरज मनजीत
बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान को रिलीज करने के मामले के बाद आईसीसी ने भी बांग्लादेश के ख़िलाफ़ कड़ा रुख अपना लिया है। हम पिछले एक साल से देख रहे हैं कि बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों को निर्ममता से मारा जा रहा है। उनके घरों को जलाया जा रहा है और मंदिरों पर क्रूर हमले किए जा रहे हैं। इस बात को लेकर भारत का बहुसंख्यक समुदाय आंदोलित, आक्रोशित और बेहद फ़िक्रमंद है। आईपीएल के इस सीजन के लिए मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स ने ख़रीदा था। बहुसंख्यक समुदाय के ज़्यादातर लोगों को यह बात खटक रही थी कि उनके निर्दोष हिन्दू भाई वहाँ मारे जा रहे हैं और उनका कोई क्रिकेटर यहाँ से इतनी मोटी रकम ले जा रहा है। बहुसंख्यक समुदाय के विरोध और गुस्से को देखते हुए, उनके जज़्बात का ख़्याल रखते हुए बीसीसीआई ने कोलकाता राइडर्स के मालिकान से कहा कि वे फ़ौरन मुस्तफिजुर को फ्रेंचाइजी से बाहर कर दें। 

ज़ाहिर था कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) पर इसकी प्रतिक्रिया होना ही थी। बीसीबी ने इसकी ख़िलाफ़त करते हुए कहा कि वे फरवरी में भारत की धरती पर खेले जाने वाले टी20 वर्ल्ड कप में तभी खेलेंगे, जब उनके सारे मैच श्रीलंका में स्थानांतरित किए जाएँ। बांग्लादेश बोर्ड के इस फ़ैसले पर आईसीसी ने बहुत ही कड़ा रुख अपनाया है। आईसीसी ने साफ़ तौर पर कहा है कि वर्ल्ड कप के सारे मैच जारी शेड्यूल के हिसाब से ही होंगे और बांग्लादेश की टीम को कोलकाता और मुंबई में पूर्व निर्धारित मैच खेलने होंगे। यदि बांग्लादेश की टीम भारत नहीं आती है, तो उन्हें  अंक गँवाने होंगे। बांग्लादेश को अपने चारों ग्रुप मैच ईडन गार्डन और वानखेड़े स्टेडियम में खेलने हैं। फ़िलहाल ये पूरा मामला अटका हुआ है और आईसीसी एवं बीसीबी के बीच बातचीत जारी है।

मुस्तफिजुर रहमान को रिलीज करने को हमारे अपने कुछ प्रबुद्ध उदारवादियों ने ग़लत ठहराया है। उनका कहना है कि खेलों और खिलाड़ियों को राजनीति से दूर रखना चाहिए। उनकी बात से इत्तफ़ाक किया जा सकता है, बशर्ते कि हालात सामान्य हों। बांग्लादेश में तो परिस्थितियां असाधारण हैं। वहाँ हिंदुओं से अवांछित घृणा करनेवाले हिंसक चरमपंथियों का सत्ता पर कब्ज़ा है। इन प्रबुद्धजनों से पूछा जाना चाहिए कि दुनिया में ऐसा कौन सा इलाक़ा बचा है, जो राजनीति से अछूता है। खेद और आश्चर्य है कि ये उदारवादी प्रबुद्धजन हिंदुओं पर हो रहे क्रूर अत्याचार पर बड़ी ही चालाक किस्म की ख़ामोशी अख़्तियार कर लेते हैं और जैसे ही कोई कड़ा क़दम उठाया जाता है, ये ख़िलाफ़त पर उतर आते हैं। हम इन्हें तथाकथित नहीं कहेंगे, क्योंकि इनमें अधिकांश लोग मानवीय संवेदना से भरे प्रबुद्धजन हैं। मगर कहीं-न-कहीं इनकी मानवीय संवेदनाओं पर राजनीति अथवा विचारधारा की कट्टरता हावी हो जाती है। 

उदारवाद का चोला पहने कुछ लोग तो वाकई ऐसे तथाकथित प्रबुद्धजन हैं, जो एक खास एजेंडे के तहत हिंदुओं पर बरती जा रही क्रूरता को जस्टिफाई करने लगते हैं। न्यूयॉर्क के नए नवेले मेयर जोहरान ममदानी को ही देख लीजिए, जो दिल्ली दंगों के आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के लिए कुछ सीनेटरों से मिलकर अमेरिका से अपना एजेंडा चला रहे हैं। खुद को लिबरल कहने वाले इन हृदयहीन लीडरों के पास दंगों में मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के लिए एक शब्द भी नहीं है। ऐसे में इनका उदारवाद हमारे किस काम का है। मुस्तफिजुर को कोलकाता राइडर्स से बाहर किया जाना बांग्लादेश की अमानवीय घटनाओं की ख़िलाफ़त करने का एक प्रतीकात्मक क़दम है। इस मामले में बांग्लादेश की प्रतिक्रिया के बाद एक बार फिर  दुनिया का ध्यान अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की तरफ़ गया है। यही इस पूरे एपिसोड का उद्देश्य भी है। 

खेलों में राजनीति की दखलंदाजी कोई पहली बार नहीं हो रही है। यह तो मात्र छोटा सा मामला है। 1980 में जब दुनिया में शीत युद्ध चरम पर था, तब अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के कहने पर 65 देशों ने मॉस्को ओलंपिक का बहिष्कार कर दिया था। उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ की आर्मी मौजूद थी। सोवियत आर्मी की दखलंदाजी के विरोध में अमेरिकी ब्लॉक के देश मॉस्को ओलंपिक में नहीं गए थे। इसके जवाब में 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में सोवियत संघ के ब्लॉक के देश शामिल नहीं हुए थे। खेलों में राजनीति के दख़ल के ये सबसे बड़े मामले थे।

इनके अलावा क्रिकेट में भी कई ऐसे दृश्य देखे गए हैं। 1970 में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीतियों की वजह से आईसीसी ने उस पर अतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की बंदिश लगा दी थी। यह बंदिश पूरे 21 साल तक चली थी। 1991 में जब दक्षिण अफ्रीका ने अपनी रंगभेदी नीतियों को बदला, तब जाकर यह बंदिश हटाई गई थी। 2003 में एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप के दौरान भी ऐसी घटनाएं हुई थीं। यह  विश्व कप दक्षिण अफ्रीका, ज़िम्बाब्वे और केन्या की संयुक्त मेजबानी में खेला गया था। इस टूर्नामेंट में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड ने मेज़बान देशों में खेलने से इनकार कर दिया था। इंग्लैंड ने ब्रिटेन सरकार ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की नीतियों के चलते हरारे में मैच खेलने से इनकार कर दिया था। जबकि न्यूज़ीलैंड ने केन्या की राजधानी नैरोबी में सुरक्षा कारणों से खेलने से मना कर दिया था। दरअसल कुछ महीने पहले मोम्बासा में बम विस्फोट हुआ था। दोनों टीमों ने मैचों की जगह बदलने की मांग की  थी, पर आईसीसी ने इनकार कर दिया। नतीजतन ज़िम्बाब्वे और केन्या को वॉकओवर दे दिया गया था। 
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