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कक्षा 1 से 12वीं तक मप्र में सरकारी स्कूलों के नामांकन में लगातार गिरावट दर्ज

UB News Network
Last updated: फ़रवरी 28, 2026 10:05 पूर्वाह्न
By : UB News Network
Published on : 2 सप्ताह पहले
कक्षा 1 से 12वीं तक मप्र में सरकारी स्कूलों के नामांकन में लगातार गिरावट दर्ज
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भोपाल 
मप्र के सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार कम हो रहा है। 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा 1 से 12वीं तक के नामांकन में 22.03 लाख तक कमी दर्ज की गई है। विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने बताया कि नामांकन में गिरावट की वैज्ञानिक जांच के लिए 8 मई 2025 को ‘अटल बिहारी सुशासन संस्थान’ को पत्र लिखा गया था।

हैरानी की बात यह है कि विभाग द्वारा रिमाइंडर के बावजूद 10 महीने बीत जाने पर भी संस्थान ने अब तक कार्ययोजना पेश नहीं की है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि विभाग ‘कागजी छात्र’ दिखाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है और असली आंकड़ों को छिपाकर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है।

दस साल में 22 लाख बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी

जीतू पटवारी ने कहा है कि पिछले 10 सालों में सरकारी स्कूलों से 22 लाख से अधिक बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं, जिससे नामांकन में भारी गिरावट आई है। उन्होंने इसे सरकार की शिक्षा नीति की पूरी नाकामी करार देते हुए दावा किया कि जहां दुनिया के विकसित देशों में बच्चे अंतरिक्ष और मंगल ग्रह पर पानी की खोज कर रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चे बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षक, ब्लैकबोर्ड, किताबें और ठीक-ठाक भवन ढूंढने को मजबूर हैं।
जीतू पटवारी ने सरकार से किए सवाल

बता दें कि विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल के जवाब में स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने जानकारी दी है कि 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के स्टूडेंट्स के नामांकन में 22.03 लाख की कमी आई है। इसे लेकर पिछले साल मई में सरकार ने अटल बिहारी सुशासन संस्थान को पत्र लिखकर नामांकन मे गिरावट की वैज्ञानिक जांच करने को कहा था। लेकिन लगभग दस महीने बीत जाने पर भी संस्थान की तरफ से इसे लेकर कोई एक्शन प्लान प्रस्तुत नहीं किया गया है जबकि इस बीच स्कूल शिक्षा विभाग उन्हें रिमाइंडर भी दे चुका है। इसी मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इन बच्चों को “लापता” की श्रेणी में रखते हुए सरकार से सवाल किया कि इतने बड़े पैमाने पर बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘प्रदेश में लाड़ली बहनें लापता होने के बाद अब स्कूल के बच्चे भी लापता हो रहे हैं।’

विपक्ष का आरोप है कि गिरावट का खेल साल 2008-09 से ही शुरू हो गया था, लेकिन सरकार केवल 2015-16 के बाद के समय की जांच करा रही है। आंकड़ों के अनुसार, 2008 से 2015 के बीच ही 40.62 लाख बच्चे कम हो चुके थे, जिसे जांच में शामिल नहीं किया गया है। विधायक ने इस पूरे मामले को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े ‘घोटाले’ से जोड़ते हुए इसकी सीबीआई जांच और सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।

एक साल में ही एक लाख छात्रों का अंतर… जानकारी में सबसे बड़ा खुलासा आंकड़ों की विसंगति को लेकर हुआ है। जानकारी में सामने आई अलग-अलग सूचियों में छात्र संख्या मेल नहीं खा रही है। वर्ष 2015-16 के लिए ही एक सूची में संख्या 22.62 लाख है, तो दूसरी में 23.57 लाख बताई गई है। एक ही साल के डेटा में एक लाख बच्चों का अंतर आया है।

आंकड़े छिपाकर करोड़ों का भ्रष्टाचार

हैरानी की बात यह है कि विभाग ने बार-बार संस्थान को याद दिलाया है। इसके बाद भी 10 महीने से ज्यादा का वक्त गुजरने के बाद भी संस्थान ने अब तक अपनी योजना नहीं दी है। विपक्ष का कहना है कि विभाग सिर्फ कागजों पर काम दिखाकर वाह-वाही लूट रहा है। असली आंकड़े छिपा कर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है।
शिक्षा के नाम पर हो रहा घोटाले

विपक्ष का कहना है कि बच्चों की संख्या में गिरावट का सिलसिला 2008-09 से ही शुरू हुआ था। सरकार केवल 2015-16 के बाद के आंकड़ों की ही जांच कर रही है।

आंकड़ों के मुताबिक 2008 से 2015 तक ही 40.62 लाख बच्चे कम हो गए थे। इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। विधायक ने इस मुद्दे को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े घोटाले से जोड़ा है। साथ ही सीबीआई से जांच कराने और सरकार से श्वेत पत्र* जारी करने की मांग की है।

एक साल में एक लाख बच्चों का फर्क

जानकारी में एक बड़ा खुलासा हुआ है जो आंकड़ों की गलती को लेकर है। अलग-अलग सूचियों में बच्चों की संख्या मैच नहीं कर रही है। जैसे कि 2015-16 के लिए एक सूची में 22.62 लाख बच्चों की संख्या दी गई है। वहीं दूसरी सूची में यह संख्या 23.57 लाख बताई गई है। यानी एक ही साल के आंकड़ों में एक लाख बच्चों का फर्क है।

    *श्वेत पत्र क्या होता है।

    श्वेत पत्र एक तरह का दस्तावेज होता है, जिसे किसी खास समस्या को समझने या उसका समाधान बताने के लिए तैयार किया जाता है। ये दस्तावेज सरकार, कंपनियां या गैर-लाभकारी संगठन उस मुद्दे पर अपने विचार और आंकड़े लोगों तक पहुंचाने के लिए जारी करते हैं। इसमें किसी नीति या समस्या का विश्लेषण किया जाता है, और अक्सर इसमें कोई समाधान या सुझाव भी दिए जाते हैं।

    इस दस्तावेज को ‘श्वेत पत्र’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि पहले इसके कवर का रंग सफेद होता था। यह दस्तावेज सार्वजनिक जानकारी और पारदर्शिता को दिखाता है, यानी कि यह जानकारी लोगों के लिए खुली होती है।

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