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अर्जुन रामपाल की कैजुअल सेक्स पर टिप्पणी ने मचाई हलचल, बहस का नया दौर शुरू

UB News Network
Last updated: जनवरी 8, 2026 3:53 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 3 महीना पहले
अर्जुन रामपाल की कैजुअल सेक्स पर टिप्पणी ने मचाई हलचल, बहस का नया दौर शुरू
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मुंबई 
एक वक्त था जब सेक्स का जिक्र भी समाज में फुसफुसाहट में किया जाता था, लेकिन आज बातचीत कहीं ज्यादा खुली और बेबाक हो चुकी है. कैजुअल सेक्स को मॉडर्न सोच, आत्मविश्वास और पर्सनल चॉइस का प्रतीक माना जाता है. किसी के साथ रहना या न रहना, हां कहना या मना करना. ये सभी फैसले व्यक्ति के निजी अधिकार हैं. लेकिन इस खुली सोच के बीच एक सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है. उस एक पल के बाद क्या होता है, जब एक्साइटमेंट खत्म हो जाती है और इंसान अपने खाली कमरे में अकेला रह जाता है?

रणवीर इलाहाबादिया के पॉडकास्ट में अर्जुन रामपाल की एक टिप्पणी ने इसी अनकहे पहलू की ओर ध्यान खींचा. उन्होंने कहा कि हम फिजिकल अट्रैक्शन को तो आसानी से समझ लेते हैं, लेकिन उस इमोशनल कीमत को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमारा मन चुपचाप चुकाता है. कैजुअल सेक्स सिर्फ एक रात का अनुभव नहीं होता, कई बार यह अपने पीछे मेंटल स्ट्रेस, उलझन और एक अजीब-सा खालीपन छोड़ जाता है, जिसके लिए हम तैयार नहीं होते.

अर्जुन के मुताबिक, चाहे हम इसे कितना ही ‘कैजुअल’ क्यों न कह लें, जब दो लोग शारीरिक रूप से करीब आते हैं तो वहां एनर्जी और फीलिंग्स शेयर करते ही हैं. ‘नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’ सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन असल जिंदगी में दिमाग और दिल को इससे पूरी तरह अलग कर पाना आसान नहीं होता. रिश्ता अचानक खत्म होने पर कई लोग खुद को इमोशनली सुन्न या अकेला महसूस करने लगते हैं.

इस मनोवैज्ञानिक उलझन को साइंस भी समझाता है. गेटवे ऑफ हीलिंग की फाउंडर और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत बताती हैं कि फिजिकल रिलेशन के दौरान दिमाग में ऑक्सिटोसिन और डोपामिन जैसे हार्मोन रिलीज होते हैं, जो जुड़ाव की फीलिंग को पैदा करते हैं. शरीर किसी से कनेक्ट करना चाहता है, जबकि दिमाग खुद को समझाता रहता है कि यह सिर्फ कैज़ुअल है. यही टकराव कई बार सुबह उठते ही अकेलेपन या अचानक उदासी का कारण बनता है.

दिल्ली के सीके बिड़ला अस्पताल की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. त्रिप्ती राहेजा बताती हैं कि उन्होंने कई ऐसे लोग देखे हैं जिन्हें अपने फैसले पर पछतावा नहीं होता, फिर भी बाद में खालीपन, बेचैनी या आत्मविश्वास में कमी महसूस होती है. वहीं फोर्टिस अस्पताल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. दीक्षा अथवानी मानती हैं कि इसे मिस्टीरियस एनर्जी नहीं, बल्कि हार्मोनल और इमोशनल बॉन्डिंग के रूप में समझा जाना चाहिए. 

सेक्शुअल लिबरेशन का मकसद डर और शर्म से आजादी था, लेकिन आज भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है. सोशल मीडिया पर थ्रिल, फ्लर्टिंग और एक्साइटमेंट तो दिखते हैं, लेकिन रात के 3 बजे का खालीपन कोई पोस्ट नहीं करता. मुद्दा यह नहीं कि कैज़ुअल सेक्स सही है या गलत. सच यह है कि यह हर किसी के लिए इमोशनली न्यूट्रल नहीं होता.

अगर यह आपको सुकून देता है, तो ठीक है. अगर यह आपको उलझा और खाली छोड़ देता है, तो वह भी एक सच्चाई है. असली आजादी तब है, जब हम बिना शर्म और जजमेंट के अपनी फीलिंग्स को एक्सेप्ट करें और वही चुनें जो हमें लंबे समय में संभाल सके. न कि सिर्फ वही जो समाज या सोशल मीडिया में ट्रेंड कर रहा हो.

TAGGED:Arjun RampalEntertainment
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