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दूध वाले की 60,000 करोड़ की ठगी, मिडिल क्लास को पड़ा भारी, क्या मिलेगा पैसा वापस

UB News Network
Last updated: मार्च 22, 2026 10:53 पूर्वाह्न
By : UB News Network
Published on : 1 महीना पहले
दूध वाले की 60,000 करोड़ की ठगी, मिडिल क्लास को पड़ा भारी, क्या मिलेगा पैसा वापस
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रूपनगर

एक दूध बेचने वाला व्यक्ति जिसने 60,000 करोड़ के घोटाले को अंजाम देकर पूरे देश की इकोनॉमी को ही हिला कर रख दिया, जब भी देश में बड़े-बड़े घोटालों की बात आती है तो इस व्यक्ति और स्कैम का नाम भी जरूर आता है. करोड़ों रुपये के इस घोटाले ने निवेशकों की नींद उठा दी. हम बात कर रहे हैं पीएसीएल (PACL) यानी पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड स्कैम को दूध बेचने वाले निर्मल सिंह भंगू ने अंजाम दिया था. ये मामला अब एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है, क्योंकि 20 मार्च 2026 को ED ने बड़ी कार्रवाई की. ED ने पंजाब और दिल्ली में PACL से जुड़ी 126 अचल संपत्तियां जब्त कीं, जिनकी कीमत 5,046.91 करोड़ रुपये है. इस एक्शन के साथ इस केस में कुल जब्त संपत्तियों का मूल्य बढ़कर 22,656.91 करोड़ रुपये हो गया है. ED का कहना है कि यह एक ही मामले में अब तक की सबसे बड़ी अटैचमेंट है और ये एजेंसी के इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई। 

इस घोटले की शुरुआत पंजाब के रूपनगर जिले के बेला गांव में रहने वाले निर्मल सिंह भंगू ने की. वह दूध का कारोबार करते था. 1990 के दशक में उन्होंने PACL लिमिटेड शुरू की. कंपनी ने खुद को कृषि भूमि बेचने और विकसित करने वाली फर्म बताया. लोग छोटी-छोटी किस्तों में या कैश में पैसे देते थे, और बदले में कृषि जमीन का प्लॉट मिलने का वादा किया जाता था. कंपनी जिस जमीन में निवेश का दावा करती थी, उसके कोई पुख्ता कागज या सेल डीड निवेशकों को नहीं दिखाए जाते थे. लोगों को सिर्फ एक साधारण रिसीट दी जाती थी, जो असल में ज्यादा भरोसेमंद नहीं होती थी। 

10 साल में पैसा 4 गुना करने का वादा
कंपनी कहती थी कि वह देश के किसी भी हिस्से में जमीन खरीदेगी, लेकिन निवेशकों को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि उन्हें फिक्स रिटर्न का लालच दिया जाता था. कंपनी का दावा था कि 5 साल बाद निवेशक चाहें तो पैसा ले सकते हैं या जमीन हासिल कर सकते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग सिर्फ रिटर्न पर ही ध्यान देते थे. इतना ही नहीं, 10 साल में पैसा 4 गुना करने का वादा भी किया जाता था, जिसने लोगों को तेजी से आकर्षित किया।

पोंजी स्कीम से निवेशकों को लुभाया
यह एक पोंजी स्कीम थी और इसे उसी तरीके से चलाया गया. शुरुआत में कंपनी ने कुछ निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया, जिससे लोगों का भरोसा बढ़ा और वे दूसरों को भी जोड़ने लगे. दरअसल, नए निवेशकों के पैसे से पुराने निवेशकों को भुगतान किया जा रहा था. ज्यादा रिटर्न देखकर और लोग इसमें पैसा लगाने लगे. स्कीम को फैलाने के लिए कंपनी ने पिरामिड मॉडल अपनाया, जिसमें हर व्यक्ति को अपने नीचे नए लोगों को जोड़ना होता था. एजेंट्स को मोटा कमीशन दिया जाता था, जिससे वे अपने जान-पहचान के लोगों को इसमें शामिल करते गए. लोगों को आकर्षित करने के लिए कंपनी बड़े-बड़े सेमिनार भी आयोजित करती थी, जहां निवेश के फायदे गिनाए जाते थे। 

कंपनी दावा करती थी कि वह 1983 से काम कर रही है, जबकि हकीकत में इसकी शुरुआत 1996 में हुई थी. 1983 में पर्ल्स ग्रुप की एक दूसरी कंपनी PGF शुरू हुई थी, जिसका सहारा लेकर लोगों का भरोसा जीता गया. निवेशकों को यह भी कहा जाता था कि अगर कंपनी बंद हो जाए तो वे अपनी रसीद लेकर कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री (MCA) में जा सकते हैं, क्योंकि कंपनी वहां रजिस्टर्ड है. लेकिन सच्चाई यह थी कि वह रसीद किसी कानूनी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती थी और निवेशकों के लिए बेकार साबित हुई। 

एग्रीकल्चरल इनकम का लालच
कंपनी ने देश भर में 70 लाख एजेंट्स की मदद ली. ये एजेंट ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में घूम-घूमकर लोगों को लुभाते थे. टैक्स-फ्री “एग्रीकल्चरल इनकम” का लालच दिया जाता था. कुल मिलाकर कंपनी ने 60,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए, जिसमें से करीब 48,000 करोड़ रुपये निवेशकों को आज तक नहीं लौटाए गए. इस घोटले से प्रभावित लोग 5.5 करोड़ से ज्यादा हैं और इसमें ज्यादातर गांव और मिडिल क्लास के परिवार वाले हैं, जिन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी इसमें लगा दी। 

सुप्रीम कोर्ट ने लिया अहम फैसला
1998-99 के दौरान ऐसी कई स्कीमों की शिकायतें मिलने के बाद सेबी ने “कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम (CIS) रेगुलेशन” लागू किया. इसके तहत कंपनियों को निवेशकों से जुटाए गए पैसे का सही इस्तेमाल करना होता है और उससे मिलने वाला रिटर्न ट्रांसपरेंट तरीके से देना होता है. जांच में सेबी ने पाया कि PACL और PGF इन नियमों का पालन नहीं कर रही थीं, जिसके बाद सेबी ने दोनों कंपनियों को बंद करने और निवेशकों का पैसा लौटाने का निर्देश दिया। 

मामला आगे बढ़ने पर सेबी सुप्रीम कोर्ट पहुंची और 25 फरवरी 2013 को कोर्ट ने साफ कहा कि यह कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम (CIS) है, इसलिए सेबी को जांच और कार्रवाई का अधिकार है. इस दौरान PACL के प्रमोटर्स निवेशकों के पैसों से अपनी संपत्तियां बढ़ाते रहे. कंपनी ने P7 नाम का एक न्यूज चैनल भी शुरू किया, जिससे लोगों का भरोसा बनाए रखा गया. इतना ही नहीं, कंपनी आईपीएल टीम किंग्स इलेवन पंजाब की स्पॉन्सर भी रह चुकी थी और क्रिकेटर ब्रेट ली को ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था. लंबे समय तक मामला कोर्ट में चलता रहा, इसी बीच कंपनी ने तेजी से पैसे जुटाए और करीब 5.5 करोड़ लोग इस घोटाले का शिकार हो गए, जिनमें पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लोग बड़ी संख्या में शामिल थे। 

निर्मल सिंह भंगू की गिरफ्तारी
22 अगस्त 2014 को सेबी ने जांच के बाद कंपनी को निवेशकों का पैसा लौटाने का आदेश दिया, लेकिन PACL ने इसका पालन नहीं किया. इसके बाद मामला ED के पास गया, जिसने कंपनी के प्रमुख निर्मल सिंह भंगू से पूछताछ शुरू की और उनकी संपत्तियां अटैच करनी शुरू कर दीं. जांच में ऑस्ट्रेलिया में करीब 500 करोड़ रुपये की संपत्ति समेत कई अन्य असेट्स का पता चला, जिसके बाद रिफंड की प्रक्रिया शुरू की गई. 2016 में CBI ने निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया. जांच के दौरान करीब 1300 संदिग्ध बैंक खाते मिले और लगभग 280 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की गईं. साथ ही 108 करोड़ रुपये दिल्ली हाईकोर्ट में जमा कराए गए. एजेंसी को करीब 20 हजार करोड़ रुपये से जुड़े डॉक्यूमेंट्स भी मिले, जिनकी वैल्यू लगभग 5000 करोड़ रुपये आंकी गई। 

सहारा ग्रुप जैसा मामला
यह स्कीम सहारा ग्रुप के घोटाले से बहुत मिलती-जुलती है. सहारा ने भी छोटी रकम इकट्ठी की थी और रिटर्न या जमीन का वादा किया था. PACL ने भी मल्टी-लेवल मार्केटिंग (MLM) स्टाइल में काम किया, लेकिन हकीकत में ज्यादातर निवेशकों को जमीन कभी नहीं मिली. जांच में पता चला कि निवेशकों के पैसे से कंपनी ने खुद की संपत्तियां खरीदीं. भारत में जमीनें, इमारतें और विदेश में भी खरीद डाली. ED का कहना है कि ये सभी संपत्तियां “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” हैं, यानी ठगी के पैसों से बनी हैं.
जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो आदेश पर CBI ने FIR दर्ज की. CBI ने PACL, निर्मल सिंह भंगू और अन्य के खिलाफ केस किया. ED ने 2016 में मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का केस शुरू किया. भंगू को 2016 में गिरफ्तार किया गया और वे तिहाड़ जेल में थे. स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें पश्चिमी दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 26 अगस्त 2024 को उनकी मौत हो गई. ED ने अब तक पांच चार्जशीट दाखिल की हैं. स्पेशल PMLA कोर्ट ने इन्हें संज्ञान लिया है। 

लोगों को मिली उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में पूर्व CJI जस्टिस आरएम लोधा की अध्यक्षता में कमिटी बनाई. इस कमिटी का काम PACL की संपत्तियां बेचकर निवेशकों को पैसे लौटाना था, लेकिन जांच में सामने आया कि कंपनी ने कई संपत्तियां गुप्त तरीके से बेचने की कोशिश की. ED की रेड में ब्लैंक सेल डीड, साइन चेक बुक और आईडी प्रूफ जैसे सबूत मिले, जो सिस्टेमैटिक फ्रॉड दिखाते हैं। 

अब ED की 20 मार्च 2026 की कार्रवाई निवेशकों के लिए बड़ी उम्मीद निकलकर सामने आई. 22,656.91 करोड़ की संपत्तियां जब्त होना ईडी के लिए नया इतिहास साबित हुआ. लेकिन सवाल वही है कि क्या पैसे वापस मिलेंगे? सहारा केस की तरह यहां भी रिकवरी लंबी प्रक्रिया हो सकती है. फिलहाल, सरकार और ED सख्त कार्रवाई कर रही है. छोटे निवेशक अक्सर ऐसे स्कीम में आसानी से फंस जाते हैं, ED की रेड में इतनी बड़ी संपत्ति जब्त होने से उम्मीद है कि पैसा जल्द ही लोगों को मिल सकता है। 

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