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घर-वापसी: धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में उद्धव ठाकरे का बयान, क्या हिंदुत्व

UB News Network
Last updated: मार्च 17, 2026 7:04 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 1 महीना पहले
घर-वापसी: धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में उद्धव ठाकरे का बयान, क्या हिंदुत्व
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मुंबई 
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. जो उद्धव ठाकरे पिछले कुछ सालों से ‘सेकुलर’ राजनीति के पाले में खड़े नजर आ रहे थे, वे अब फिर से अपनी पुरानी राह यानी हिंदुत्व की ओर मुड़ते दिख रहे हैं. इसका सबसे बड़ा संकेत है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल को उनका समर्थन. इसे राजनीतिक ‘घर-वापसी‘ भी कहा जा रहा है।

उद्धव ठाकरे की राजनीति का सफर पिछले पांच सालों में किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा है. साल 2019 में जब उन्होंने दशकों पुराना बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस और शरद पवार से हाथ मिलाया, तो इसे भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ‘यू-टर्न’ कहा गया।

गठबंधन बदलने के साथ ही उद्धव पर आरोप लगने लगे कि उन्होंने सत्ता के लिए बाल ठाकरे की विचारधारा को तिलांजलि दे दी है. मुख्यमंत्री रहते हुए जब पालघर में साधुओं की हत्या हुई या सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया, तब उद्धव की चुप्पी ने उनके कट्टर समर्थक कैडर को बेचैन कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उनके हिंदुत्व के एजेंडे पर सवाल उठने लगे. इस दौरान मुस्लिम मतदाताओं के बीच उद्धव की स्वीकार्यता जरूर बढ़ी, लेकिन उनकी अपनी मूल पहचान धुंधली होती गई।

वक्फ बिल और शिंदे का प्रहार
पार्टी में टूट के बाद जब वक्फ संशोधन कानून की बात आई, तो उद्धव की पार्टी (यूबीटी) ने इसका विरोध किया. इस मौके को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हाथ से जाने नहीं दिया. शिंदे ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उद्धव अब वही भाषा बोल रहे हैं जो ओवैसी बोलते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उद्धव अब ‘जनाब’ सेना बन चुके हैं।

महाराष्ट्र चुनाव परिणाम और हकीकत का सामना
हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उद्धव ठाकरे को आईना दिखा दिया. पार्टी न केवल दो फाड़ हुई, बल्कि चुनावी मैदान में भी धराशायी हो गई. मुस्लिम वोटों के भरोसे वे अपनी पुरानी जमीन नहीं बचा सके. अब जब अस्तित्व पर संकट आया है, तो उद्धव को फिर से उसी हिंदुत्व की याद आई है जिसके दम पर शिवसेना खड़ी हुई थी. धर्मांतरण विरोधी बिल का समर्थन करना इसी ‘घर वापसी’ की कोशिश का हिस्सा है. वे यह संदेश देना चाहते हैं कि भले ही वे विपक्षी गठबंधन में हैं, लेकिन हिंदुत्व के बुनियादी मुद्दों पर समझौता नहीं करेंगे।

क्या है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल और इसकी बारीकियां?
महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार जिस धर्मांतरण विरोधी कानून को लाने की तैयारी में है, वह केवल एक कानून नहीं बल्कि देश में एक बड़ी बहस और विवाद भी है. इस बिल के जरिए सरकार राज्य में जबरन या लालच देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर लगाम लगाना चाहती है।

-बिल में अवैध धर्मांतरण की परिभाषा लंबी-चौड़ी है. जबरदस्ती. लालच. धोखा. भ्रम. प्रलोभन. गलत बयानी. दबाव. या किसी की मजबूरी का फायदा उठाना. नाबालिगों का मामला भी शामिल है।

-अगर कोई शादी के जरिए धर्म बदलवाता है तो वह शादी भी रद्द मानी जाएगी. बच्चे का धर्म भी तय करने का प्रावधान है. अगर शादी अवैध तरीके से हुई तो बच्चे का धर्म मां या बाप के मूल धर्म के हिसाब से होगा।

-कोई धर्म बदलना चाहे तो 60 दिन पहले जिला अधिकारी को सूचना देनी होगी. पुलिस खुद से भी कार्रवाई कर सकती है. एफआईआर कोई भी रिश्तेदार दे सकता है. मां बाप भाई बहन या खून का रिश्ता रखने वाला।

-सबूत का बोझ उल्टा है. आरोपी को साबित करना होगा कि धर्मांतरण वैध था. पीड़ित को नहीं।

-सजा भी भारी है. अवैध धर्मांतरण पर सात साल जेल और एक लाख रुपए जुर्माना. सामूहिक धर्मांतरण पर सात साल जेल और पांच लाख जुर्माना. दोबारा अपराध पर दस साल तक जेल हो सकती है।

महाराष्ट्र सरकार का टारगेटः देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी इस बिल के जरिए अपने कोर हिंदू वोट बैंक को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि वे उनकी संस्कृति और अधिकारों के रक्षक हैं. साथ ही, इस बिल पर उद्धव ठाकरे का समर्थन हासिल करना बीजेपी की एक बड़ी रणनीतिक जीत है. इससे विपक्ष की एकजुटता में दरार भी दिखती है और उद्धव की मजबूरी भी उजागर होती है।

भारत के अन्य राज्यों में क्या है धर्मांतरण विरोधी कानून की स्थिति
धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य नहीं है. अब तक भारत के लगभग 10-12 राज्यों में इस तरह के कानून लागू हैं या प्रक्रिया में हैं. इनमें से ज्यादातर बीजेपी शासित राज्य हैं:

उत्तर प्रदेश: यहां सबसे पहले और सबसे कड़ा कानून लाया गया.

उत्तराखंड: यहां भी सख्त प्रावधान लागू हैं.

मध्य प्रदेश और गुजरात: इन राज्यों ने भी अपने पुराने कानूनों को और कड़ा किया है.

कर्नाटक (पिछली सरकार में) और हरियाणा: यहां भी कानून पारित किए गए हैं.

उद्धव ठाकरे का इस बिल को समर्थन देना सत्ता से दोबारा करीबी बनाने की एक छटपटाहट भी हो सकती है और अपनी खोई हुई साख को बचाने का आखिरी दांव भी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता इस ‘सुविधाजनक हिंदुत्व’ पर दोबारा भरोसा करेगी? महाराष्ट्र की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां विचारधारा और सत्ता की भूख के बीच की लकीर बहुत पतली हो गई है. क्या उद्धव फिर से शेर की तरह दहाड़ पाएंगे या यह केवल एक चुनावी पैंतरेबाजी बनकर रह जाएगी?

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