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बिहार की राजनीति में BJP की बढ़त: JDU पर कैसे भारी पड़ी भगवा पार्टी

UB News Network
Last updated: मार्च 5, 2026 7:32 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 1 महीना पहले
बिहार की राजनीति में BJP की बढ़त: JDU पर कैसे भारी पड़ी भगवा पार्टी
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नई दिल्ली
बिहार की राजनीति में भाजपा और जेडीयू का गठबंधन दशकों पुराना है, लेकिन समय के साथ इस गठबंधन की शक्ति का संतुलन अब पूरी तरह बदलता दिख रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही कभी ‘छोटे भाई’ की भूमिका में रहने वाली भाजपा आज बिहार में एनडीए की ‘सीनियर पार्टनर’ बनने जा रही है।

1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ नीतीश कुमार ने एक गठबंधन तैयार किया। उस समय नीतीश कुमार की समता पार्टी का आधार बड़ा माना जाता था। 2000 में झारखंड अलग होने से पहले का आखिरी चुनाव था। इस समय नीतीश कुमार की साख बिहार में निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी। अक्टूबर 2005 में जब पहली बार नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी तो जदयू ने 88 सीटें जीतीं और भाजपा ने 55 सीटें। नीतीश कुमार की पार्टी स्पष्ट रूप से सीनियर पार्टनर थी।

2010 के विधानसभा में नीतीश कुमार की लोकप्रियता का चरम था। जदयू ने 115 सीटें जीती, जबकि भाजपा 91 सीटों पर रही। सीट शेयरिंग में भी जदयू को ज्यादा सीटें मिली थीं। लेकिन जैसे ही 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की एंट्री होती है तो नीतीश कुमार असहज हो गए। 2013 में भाजपा के द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया। उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन का गठन किया।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले दम पर शानदार प्रदर्शन किया, जबकि जदयू मात्र 2 सीटों पर सिमट गई। यह पहला संकेत था कि बिहार में भाजपा का जनाधार अब स्वतंत्र रूप से बढ़ चुका है। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार राजद के साथ गए। हालांकि वह चुनाव जीत गए, लेकिन भाजपा ने अकेले लड़कर भी 24.4% वोट शेयर हासिल किया, जो किसी भी अकेली पार्टी से ज्यादा था।

सीनियर पार्टनर बनने का सफर
2017 में नीतीश कुमार वापस एनडीए में आए, लेकिन अब भाजपा की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ चुकी थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और भाजपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को 74 सीटें मिलीं और जेडीयू को सिर्प 43। यह पहला अवसर था जब एनडीए के भीतर भाजपा, जदयू से काफी आगे निकल गई । हालांकि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन संख्या बल के मामले में भाजपा ‘बड़े भाई’ की भूमिका में आ गई। इस चुनाव में चिराग पासवान ने जेडीयू की अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

2024 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू और भाजपा को बराबर की सीटें मिलीं। दोनों के 12-12 सांसद चुनाव जीते। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं, जेडीयू 85 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। आपको बता दें कि 2025 के चुनाव में एनडीए में रहते हुए जेडीयू पहली बार बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा। दोनों ही दलों ने 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

भाजपा के फैक्टर
भाजपा का कोर वोट बैंक लगातार स्थिर रहा, जबकि जदयू का वोट शेयर गठबंधन बदलने और एंटी-इंकंबेंसी के कारण प्रभावित हुआ। 2020 और 2025 के चुनावों में भाजपा का स्ट्राइक रेट जदयू की तुलना में काफी बेहतर रहा। 2014 के बाद से भाजपा ने बिहार के ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में अपनी स्वतंत्र पैठ मजबूत की, जो पहले कभी केवल नीतीश कुमार की ताकत मानी जाती थी।

 

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