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UGC रूल्स पर SC की दोटूक चेतावनी, लगाई रोक; बोले– देश के सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा

UB News Network
Last updated: जनवरी 29, 2026 7:52 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 3 महीना पहले
UGC रूल्स पर SC की दोटूक चेतावनी, लगाई रोक; बोले– देश के सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा
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नई दिल्ली
यूजीसी रूल्स को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इन नियमों को लेकर देश भर में विवाद हो रहा था और सवर्ण समाज के लोगों ने ऐतराज जताया था। यह कहा जा रहा था कि इन नियमों में सवर्ण समाज को पहले से ही दोषी मान लिया गया है और जांच कमेटी में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित नहीं किया गया है। इसके अलावा एससी, एसटी के साथ ही ओबीसी को भी भेदभाव के दायरे में लाए जाने को लेकर भी ऐतराज था। यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो बेंच ने अगले आदेश तक रोक लगा दी।
 
अदालत ने कहा कि फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाई जाए। कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक कमेटी के गठन की सलाह दी है, जो इन नियमों की समीक्षा करे। कोर्ट ने सरकार को सलाह दी है कि वह यूजीसी के इन नियमों की भाषा को देखे और नए सिरे से नियमों को जारी किया जाए। नए नियम आने तक 2012 वाले रेगुलेशन ही जारी रहेंगे। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की है। उस दिन केंद्र सरकार और यूजीसी यह जानकारी देंगे कि वह इन नियमों में समीक्षा के लिए क्या कर रहे हैं। इस तरह सरकार के पास करीब 50 दिनों का वक्त है, जिसमें उसे इन नियमों में समीक्षा को लेकर फैसला लेना है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, ‘यदि हमने दखल नहीं दिया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे समाज में बंटवारे की स्थिति पैदा होगी और उसके नतीजे खतरनाक होंगे। पृथमदृष्टया हमें लगता है कि इन रेगुलेशंस की भाषा स्पष्ट नहीं है। इसके बारे में एक्सपर्ट्स को विचार करना होगा और सही एवं स्पष्ट भाषा के साथ नए नियम जारी करने होंगे। यह भाषा ऐसी होनी चाहिए कि कोई भी इन नियमों का बेजा इस्तेमाल न कर सके।’ अदालत ने कहा कि सरकार और यूजीसी हमें 19 मार्च को इस संबंध में जवाब दे।

याचिका में कहा गया था- सवर्णों को सुनवाई का अधिकार क्यों नहीं
दरअसल याचिका में कहा गया था कि इन नियमों में सवर्णों को किसी भी तरह के भेदभाव की स्थिति में शिकायत का मौका नहीं दिया गया है। एससी, एसटी और ओबीसी को तो भेदभाव की शिकायत का अधिकार दिया गया है, लेकिन सवर्णों को ऐसा मौका नहीं मिलेगा। इसका अर्थ यह है कि उन्हें पहले ही अपराधी मान लिया गया है। इन दलीलों के साथ प्रदर्शन हो रहे थे और इसी के साथ अदालत में अर्जी दाखिल की गई थी। इसके अलावा एक मांग यह भी थी कि यदि शिकायत झूठी पाई जाती है तो फिर गलत आरोप लगाने पर भी ऐक्शन होना चाहिए।

अगर हम हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे, समाज में विभाजन होगा और इसके गंभीर प्रभाव होंगे।
प्रथम दृष्टया हम कह सकते हैं कि विनियमन की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों को इसकी भाषा को संशोधित करने के लिए जांच करने की आवश्यकता है ताकि इसका दुरुपयोग न हो।
चीफ जस्टिस ने कहा, ‘मान लीजिए कि एक छात्र साउथ का है और उत्तर के किसी राज्य में एडमिशन मिलता है। इसी तरह उत्तर वाले को दक्षिण में एडमिशन मिलता है। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि कुछ टिप्पणियां दोनों को झेलनी हों। यदि दोनों की जातियों का पता ना हो तो फिर उन्हें किस नियम के तहत समाधान मिलेगा। यह भी जानकारी होनी चाहिए।’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमने 75 वर्षों में जिस देश को वर्गहीन समाज बनाने के लिए इतनी सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। क्या अब हम उसे पीछे नहीं ले जा रहे हैं। रैगिंग में सबसे बुरी बात यह है कि दक्षिण या उत्तर-पूर्व से आने वाले बच्चे अपनी संस्कृति साथ लाते हैं और कोई अनजान व्यक्ति उन पर टिप्पणी करने लगता है। फिर आपने अलग-अलग छात्रावासों की बात की। अंतरजातीय विवाह भी होते हैं और हम भी ऐसे छात्रावासों में रहे हैं, जहां सभी एक साथ रहते थे। इसका भी ध्यान रखना जरूरी है।
सुनवाई के दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हमारी आपत्ति इन रेगुलेशंस के सेक्शन 3 (सी) को लेकर है। जातिगत भेदभाव की परिभाषा में एससी, एसटी और ओबीसी को शामिल किया गया है। इसमें जनरल कैटिगरी शामिल ही नहीं है। ऐसा तो संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है, जिसमें आप पहले ही एक वर्ग को अपराधी मान लेते हैं और उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव की शिकायत का कोई मंच ही नहीं दिया गया है।

 

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