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देश व प्रदेश की जनजातियों के 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का किया जा रहा

UB News Network
Last updated: जनवरी 28, 2026 9:59 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 3 महीना पहले
देश व प्रदेश की जनजातियों के 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का किया जा रहा
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लखनऊ
 प्रदेश के जंगलों, पहाड़ों और नदियों के किनारे गूंजने वाली जनजातीय वाद्य यंत्रों की धुनें आज आधुनिक संगीत की चकाचौंध में खोती जा रही हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश का लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान इन धुनों को फिर से जीवंत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के उद्देश्य से संस्थान देश व प्रदेश की जनजातियों के 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का संरक्षण कर रहा है। इस दिशा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में संस्थान द्वारा समय-समय पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनियां आयोजित की जा रही हैं। इन प्रदर्शनियों के माध्यम से न केवल वाद्य यंत्रों को सहेजा जा रहा है, बल्कि उन्हें बजाने वाले जनजातीय कलाकारों को भी मंच मिल रहा है। 

संरक्षित वाद्य यंत्रों में शामिल हैं प्राचीन ढोलक, नगाड़ा, डफ, ढफली, डमरू व थाली

उत्तर प्रदेश के गोंड, थारू, बुक्सा, खरवार, सहरिया, बैगा, अगरिया, चेरो व माहीगीर जैसी जनजातियों के लोकजीवन में संगीत की विशेष भूमिका रही है। मंजीरा, चिमटा, खड़ताल व घुंघरुओं की खनक,  बीन व सारंगी की सुरमयी धुनें इन समुदायों की पहचान रही हैं। डिजिटल दौर में जब ये वाद्य यंत्र धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे समय में संस्थान का यह प्रयास सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की मिसाल बन रहा है। इस क्रम में संस्थान द्वारा जनजातियों के प्राचीन ताल वाद्य यंत्रों जैसे ढोलक, नगाड़ा, डफ, ढफली, डमरू, ढक व थाली का संरक्षण किया जा रहा है। वहीं, सुर वाद्यों में बांसुरी, बीन व सारंगी तथा लय वाद्यों में मंजीरा, चिमटा, घुंघरू व खड़ताल जैसे 200 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्रों को भी संरक्षित किया जा रहा है।

कला कुंभ व कला गांव में लगाई गई वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी 

प्रदेश के लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान ने इस दिशा में पिछले वर्ष प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के अवसर पर कला कुंभ में इन वाद्य यंत्रों को प्रदर्शित किया था, जिसे देश-विदेश से आए कला प्रेमियों और पर्यटकों ने खूब सराहा। इसी तरह यूपी दिवस के अवसर पर कला गांव में भी इन वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई, जिसने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान किया। जनजातीय गौरव बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित जनजातीय भागीदारी महोत्सव में जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि ये प्रयास केवल संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक खोती हुई विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी हैं। लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान की यह पहल संदेश देती है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर ही सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा जा सकता है।

TAGGED:The state's Folk and Tribal CultureUttar Pradesh
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