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कोंडागांव में किसानों को मृदा स्वास्थ्य पत्रक अनुरूप उर्वरक उपयोग के बताए फायदे

UB News Network
Last updated: जनवरी 7, 2026 9:12 अपराह्न
By : UB News Network
Published on : 3 महीना पहले
कोंडागांव में किसानों को मृदा स्वास्थ्य पत्रक अनुरूप उर्वरक उपयोग के बताए फायदे
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कोण्डागांव.

कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्वी बोरगांव, कोंडागांव में मृदा स्वास्थ्य पत्रक अनुरूप उर्वरक उपयोग विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कृषकों को मृदा स्वास्थ्य पत्रक के महत्व, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा जैविक एवं प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करना था, जिससे टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दिया जा सके।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. सुरेश कुमार मरकाम ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य ही सतत एवं लाभकारी कृषि का मूल आधार है। यदि मृदा स्वस्थ रहेगी, तभी फसलें स्वस्थ होंगी और किसान की आय में वृद्धि संभव होगी। उन्होंने हरी खाद, फसल अवशेष प्रबंधन तथा जैविक उर्वरकों के प्रयोग पर विशेष जोर देते हुए बताया कि इन उपायों से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। साथ ही मृदा स्वास्थ्य पत्रक की सिफारिशों के अनुसार उर्वरक एवं सूक्ष्म तत्वों का संतुलित उपयोग करने से न केवल उत्पादन लागत कम होती है, बल्कि फसल उत्पादकता एवं गुणवत्ता में भी सुधार होता है। डॉ. मरकाम ने मृदा को मानव जीवन का आधार बताते हुए भावी पीढ़ियों के हित में मृदा संरक्षण एवं वैज्ञानिक फसल चक्र अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर से पधारे डॉ. कोमल सिंह केराम ने राज्य एवं जिले की मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने उर्वरक उपयोग की वैज्ञानिक विधियाँ, प्राकृतिक स्रोतों से खाद निर्माण, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, वर्मी कम्पोस्टिंग तथा मृदा गुणवत्ता प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मृदा गुणवत्ता को बनाए रखते हुए उत्पादन बढ़ाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जिले के उपसंचालक कृषि श्री कैलाश मरकाम ने विभागीय योजनाओं की जानकारी देते हुए कृषकों को उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप साग-सब्जी, मक्का, धान, दलहन एवं तिलहन आधारित फसल चक्र अपनाने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विविधीकृत खेती से जोखिम कम होता है और किसानों की आय के नए स्रोत विकसित होते हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर के पादप रोग वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र कुमार नाग ने फसलों में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों की पहचान तथा उनके नियंत्रण हेतु समन्वित कीट-रोग प्रबंधन पर जोर दिया। उन्होंने जिले में प्रमुख रूप से पाई जाने वाली फसलों में लगने वाले कीट एवं रोगों के जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण की विस्तृत जानकारी प्रदान की। जिला कलेक्ट्रेट, कोंडागांव से आए श्री रागिब अली, जिला संसाधन प्रकोष्ठ ने बताया कि कलेक्टर श्रीमती नूपुर राशि पन्ना के निर्देशानुसार जिले के 50 किसानों के खेतों की मृदा जांच की गई, जिसमें मृदा में कई पोषक तत्वों की कमी पाई गई है। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र एवं कृषि विभाग द्वारा दिए जा रहे प्रशिक्षण एवं आगामी सहयोग के माध्यम से जैव उर्वरकों के प्रयोग को अपनाने हेतु किसानों को प्रेरित किया।

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. हितेश मिश्रा ने गाय के गोबर से जैविक खाद तथा गोमूत्र से कीटनाशक एवं अन्य कृषि उपयोगी आदानों के निर्माण पर बल दिया। डॉ. भूपेंद्र ठाकुर, सस्य वैज्ञानिक ने रबी मौसम की फसलों के वैज्ञानिक प्रबंधन की जानकारी दी, वहीं डॉ. प्रिया सिंह ने उन्नत कृषि यंत्रों की उपयोगिता बताते हुए कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त करने हेतु आधुनिक यंत्रों के प्रयोग पर जोर दिया। इस कार्यक्रम में कोंडागांव, माकड़ी, फरसगांव एवं केशकाल विकासखंड के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी हेमलाल पद्माकर, तुलसी नेताम, आनंद नेताम, मीना नेताम, आत्मा योजना से टिकेश्वर नाग, संबंधित विकासखंडों के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी तथा लगभग 70 कृषकों ने सक्रिय सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया।

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